Saturday, July 31, 2010

ख्वाब...

हर वक़्त एक,
ख्वाब जो दिल में पनपता है,
और बिखरता है,
खुद से कुछ कहता है,
और खुद ही कुछ सुनता है,
कभी परियों की दुनिया में,
और कभी,
खून से भीगे,
जंग के मैदान में,
कभी किसी के वहशीपन को झेलता,
और कभी हवस से अपने हाथ धोता,
अपने वजूद को खोजता,
एक इंसानी ख्वाब,
जो कभी रात के सन्नाटे में या,
दिन के उजाले में,
हर पल हावी होने की कोशिश में,
पता नहीं क्या देखता,
और किस मंजिल का रास्ता खोजता,
खुशनुमा आबोहवा, या फिर दर्द का आफ़सार,
एक इंसानी ख्वाब,
पलकों की चिलमन में,
अंगडाईयां लेता हुआ,
अटखेलियाँ करता हुआ, सिमटता,
ऐय्यारों की ऐय्यारी सा,
नज़ारे ढूँढता,किसी को नजरबन्द करता,
नेकदिल आबिद,
या फिर दिमाग में ज़हर भरता,
एक इंसानी ख्वाब......

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