Saturday, October 8, 2016

एक खूबसूरत शाम

   एक खूबसूरत शाम 

  ज़िन्दगी की शाम बड़ी खूबसूरत है,
  जिसमे दिखती कोई सूरत है,
  बैठ के देखता रहा गौर से, इत्मीनान से ,
  तो लगा जैसे शायद यही मेरी जरुरत है ,

  शहर की गालियाँ, दर दर भटकाती रही
  बेफिक्र, नादान ख्वाहिशें , उठती रही
  कभी नींद में चलाती रही,
  और कभी नींद से जगाती रही,                                                        




                    







   आज याद आती है वो चौपाल
   जहां लगती थी कभी मजलिस,और लगते थे मज़मे ,
   यारो की गालियां भी क्या शौक से लेते ,
   और दुहराए जाते कुछ बेसुरे नगमे

   चल देता हूँ आज फिर, शाम तुझे अकेला छोड़ के
   रात के  फैलते दामन से, धुंधले  तारे कुछ तोड़ के,
   मिलूंगा तुझसे कल  इसी जगह वापिस,
   सुनाऊंगा तुझे कुछ किस्से कच्चे रस्तों  के
    कल फिर सुनूँगा तुझसे कुछ कहकहे पुरानी मोड़ के

                                                                          - सिद्धार्थ श्रीवास्तव 

Friday, July 15, 2016

धुल भरी एक मेज़

धुल भरी एक मेज़ 

तुझे अपनी यादों से भुलाऊँ भी तो कैसे, 
बह रहे है ये जो अश्क़, उन्हें छुपाऊं भी तो कैसे,
मुसलसल दफा  होती  खुशियों  को 
वापस बुलाऊँ  भी तो कैसे. 

लम्हे बस कटते  जा रहे है ,
एक लम्बे इंतज़ार में,
घड़ियां रुक गयी है ऐसे की, 
ख़ामोशी ही ख़ामोशी  है  , हर बाजार में.


खुशनुमा  गुलाबों  की क्यारियां जो थी कल तक,
आज वो है काँटों का समंदर, 
घुलती थी मिसरी सी एक हसी,  इस पगडंडी पे कभी  ,
यहां बिखरे पड़े है यूँ ही , गुजरी कुछ बातों के खंज़र 




दरवाजे  पे हो दस्तक तो,
दिल फट पड़ता है धडकने बढ़ने से 
झांक लेता हूँ चौखट पे, अचानक यू ही, 
कैसे रोकूँ खुद को अतीत में भटकने से ?

कैसी हुई खता की मुझे माफ़ी भी ना नसीब,
तक़दीर मेरी एक ज़ालिम है ? या फितरत मेरी गरीब ?
, बदल सकूं मैं मैं माज़ी का रुख, बता मुझे या रब 
एक तो होगा मौका ? कोई तो होगी तरकीब ?

तेरे वज़ूद की शम्मा में , 
अब शामें जला रहा हूँ 
तेरे दिए  कुछ तोहफों को ,
खुद से छिपा रहा हूँ 

आज भी रक्खे है बचा के 
वो मिटटी के गुलदस्ते ,
वो खिलौनों वाल ताज महल 
वो रेशम वाले बस्ते 

बरसों पुरानी तस्वीर तेरी एक , 
वो पैरहन का हिस्सा, खुशबू से लबरेज़ 
वो खतों से भरा सन्दूक पुराना
वो पलंग का सिरहाना ,वो धुल भरी एक मेज़ 

                              -सिद्धार्थ श्रीवास्तव 








Thursday, July 14, 2016

विनाश की आँधी ....

   विनाश  की आँधी ....

चल  पड़ी  है  एक  बार  फिर ,
विनाश  की  वह आँधी,
समाज  के  विघटन  की 
और  सर्वनाश  की  आँधी ...

आशा  और  निराशा  के  बीच
द्वन्द  की  एक  आँधी 
अपेक्छा  और  अभिलासा की ,
स्वछंद सी  एक  आँधी ..

निर्मम  हत्याओं  की  लगाती ,
एक  कतार  सी  यह  आँधी ,
धर्म  और  अधर्म  के  वकीलों  के 
व्यापार  की  ये  आँधी  ,

मानवता  और  संवेदना  के ,
परिहास  की  एक  आँधी ,
निरन्तर  धूमिल  होते  धैर्य  
और  विश्वास  की  एक  आँधी 




स्वार्थ  और  लोभ के  कीचड़  में  सनी 
बदहवास  यह  आँधी ,
प्रेम  और  स्नेह  की  छाया  से ,
हताश  ये  आँधी ...

आँधी  है  कोरे  उसूलों  की 
आँधी  है  झूठे  रसूलों  की 
झूठे  बहकावे , क्षणिक आवेश 
और  कच्चे  उन्माद  की  एक  आँधी 

सोई  रही  जो  सदियों  तक ,
बरसों पड़ी  थी  कब्र  में ,
अब  आज़ाद  है  ये  आँधी 
अब  आज़ाद  है  ये  आँधी 

                  -सिद्धार्थ श्रीवास्तव 

परिचय का पर्चा

                                                         परिचय का पर्चा



अपना परिचय चंद शब्दों में देना चाहूँगा . मेरा नाम सिद्धार्थ श्रीवास्तव है. पर आज कल की भाग दौर की जिंदगी में जहाँ इंसान को सांस लेने की फुर्सत न हो, वहां मैं आपको इतनी तकलीफ नहीं देना चाहूंगा. बहरहाल आप मुझे सिधू भी बुला सकते है. कॉलेज के कुछ लटिफेबाज और आवारागर्द लौंडो ने मेरा यह  नाम पता नहीं क्या सोच के  रखा. पर पते की बात कहें तो यही लड़के मेरे घनिष्ठा मित्र थे. आज इतने सालों बाद भी मैं यही नाम लोगों के मुंह से सुनना चाहता हूँ, और अपनापन महसूस करता हूँ.

मैं  एक असाधारण  भारतीय नर हूँ , जिसे क्रिकेट और चटपटी राजनीती से रत्ती भर भी लगाव नहीं. संगीत मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा है, और मुझमे हमेशा एक आशा की किरण जगाए रखता है.  दर्शन मेरे लिए हमेशा से ही महत्वपूर्ण रहा है . प्रकृति दर्शन . माफ़ कीजियेगा दर्शन शास्त्र तो बताना भूल ही गया

इस ब्लॉग में मैंने अपने जीवन में उठने वाली भावनात्मक तरंगो को एक रूप देने की कोशिश की है . मेरी कवितायेँ और शायरियाँ मेरे अंदर उठने वाले  रोजमर्रा के सवालों का ही एक अवतार मात्र है. मैं अपनी ज़िन्दगी का वो पल कभी नहीं भूल सकता .जब पहली बार मैंने गुलज़ार साहब के द्वारा लिखे हुए तराने सुने . और गायक भी कोई और नहीं , बल्कि सुर सम्राट स्व जगजीत सिंह जी. इस एल्बम का नाम मरशिम था. बस यू समझ ले की गुलज़ार साहब ने मेरी नब्ज़ पकड़ ली. एक गाने के बोल कुछ ऐसे थे -

एक पुराना मौसम लौटा
याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है
वो भी हो तनहाई भी

मैं भावना की आंधी में बहने लगा, पर शब्दों के जाल से निकल नहीं पा रहा था. और शायद आज भी उसी जाल में एक मछली की तरह हूँ.






 सुबह सुबह  इक  खाब  की  दस्तक  पर  दरवाजा  खोला
 देखा  सरहद  के  उस  पार  से  कुछ  मेहमान  आये  हैं
 आँखों  से  मायूस  सारे , चहरे  सारे  सुने  सुनाये
 पाँव  धोए  हाथ  धुलाए , आँगन  में  आसान  लगवाए
 और  तंदूर  पे  मक्की  के  कुछ  मोठे  मोठे  रॉट  पकाए
 पोटली  में  मेहमान  मेरे
 पिछले  सालों  की  फसलों   का  गुड   लाये  थे
 आँख  खुली  तोह  देखा  घर  में  कोइ नहीं  था
 हाथ  लगाकर  देखा  तोह  तंदूर  अभी  तक   बुझा  नहीं  था
 और  होंटो  पर  मीठे  गुड़  का  जायका  अब   तक  चिपक  रहा  था
 खाब  था  शायद  खाब  ही  होगा
 सरहद   पर  कल  रात  सुना  था  चली  थी गोली
 सरहद  पर  कल  रात  सुना  है  कुछ  ख़ाबों  का  खून  हुआ है







Wednesday, July 13, 2016

कशमकश

                                                                 कशमकश 



बड़ा चंचल है मन आज 
बड़ी परेशान है आत्मा 
कोई भूचाल सा है दिल में 
जिंदगी बड़ी मुश्किल में 

कभी अगले देखता , कभी बगले, 
कभी गाड़ियां देखता, कभी बंगले
कभी इस पार , तो कभी उस पार
अंदर एक बार , तो बाहर बार बार 

मौसम  का जायज़ा लेने में ,
भला क्या बुराई है, 
भरी महफ़िल में बैठे है ,
साहब, पर फिर भी तन्हाई है 




खून खौलता है, बुलबुले ले कर,
खुशियां ले जाता है, कोई जख्म दे कर
मुर्दो की भीड़ में , उल्टा चल रहा हूँ जैसे 
अंदर कुछ, बाहर कुछ, ये चेहरे कैसे कैसे 

मुकद्दर पे रोता है आका, 
और मज़लूम  खुशियां मनाता है 
इस टूटे चिराग की दस्तान क्या बताएं
इसका जिंन्न  बस आफत ही लाता है, 

 क्या इसी कशमकश  का नाम ज़िन्दगी है ,
जहाँ बंदगी में भी थोड़ी  गन्दगी है 
इंसान की रूह को यहाँ आग नसीब नहीं ,
वहां जानवरों को क्यों शर्मिंदगी है ?


- सिद्धार्थ श्रीवास्तव 




Saturday, July 11, 2015

कौन है कलाकार?

कौन है कलाकार?

अपने सपनो को जो करना चाहता है साकार
आसान राहों को छोड़ जो जीवन से करे साक्छात्कार
वो ही है कलाकार

ह्रदय की कंपन
और बहती भावनाओं  को जो दे आकार
कला से जो प्रेम करे बिना त्रुटि ,बिना विकार
वो ही है कलाकार

हर पल मुस्कुराये वो
दुःख भी गा कर सुनाये जो
परिस्थितियों से जिसने मानी नहीं हार
तालियों की गूंज से सजा मंच ही  जिसका संसार
वो ही है कलाकार





































पात्रो को जिवंत करता
कोरे मखमल में रंग भरता
नई सृष्टि की रचना करता
संगीत से जोड़े  टूटे तार
वो ही है कलाकार

कौन है कलाकार ?

एक कलाकार वो भी है
जिसने इस जग को बुना
हाड मांस को जीवन देकर
अपना माध्यम हमें चुना
हम उसी की  कला का हिस्सा हैं,
और वो है हमारा कलाकार

लेखक-सिद्धार्थ श्रीवास्तव (सिद्धू)
चित्र- सूरजो ( प्रोफेशनल संगीत कलाकार एंड परफ़ॉर्मर )


Sunday, July 5, 2015

अश्क

 अश्क

अश्क  बोलते  है ,
कुछ  टटोलते  है ,
गम  में  डोलते  है ,
और  ख़ुशी  भी  तोलते है
जाने  कहा  रहते  है ,
की   ये  बात  नहीं  मानते
जाने  क्यों  बहते  है ,
ये  वजूद  भी  नहीं  जानते
मन  की  गहराई  से ,
दिल  की  तन्हाई  से ,
है  क्या  इनका  रिश्ता
जिंदगी  की  राहों में
गिरे  किसी  अपनों  की  बाँहों  में
आहिस्ता  आहिस्ता
सपनो  के  बिखरने  से
बिखरते  है  ये  भी
उमंगो     मचलने  से
मचलते  है  ये  भी ,
कभी  सावन  बन  कर
दरिया  बनाते  है,
कभी  आते  नही  बुलाने से भी
शायद  कही  छुप जाते  है




























शरमाते  है  ये  ,
भीड़  में  आने  से ,
बेफिक्र  निकलते  है  बेपरवाह  यूँ ही ,
बेपर्दा  हो  ज़माने  से
पर  गुज़ारिश  है  इनकी ,
आँखों  में  हो  आशियाना
ख्वाहिश  में  इनकी ,
ना कोई  ठौर  ,ना  कोई  ठिकाना
सुन  सको  तो  सुन  लो
इनकी  दबी  हुई  आहट
कही  नफरत  का  अफ़साना  हैं .
कही  बेहिसाब  चाहत
अश्क   है  ये  बड़े   अज़ीज़
इन्हे महज  पानी ना मान  लेना ,
इंसान  के  हो  या  फ़रिश्ते के
इनकी एहमियत  जान  लेना



-सिद्धार्थ श्रीवास्तव ( सिद्धू)

मेरी कहानी

 एक शक्ति है अजीब सी ,  एक प्रकाश है गजब का ,  एक पुंज है अनंत सा,  ना शुरू, ना ही अंत सा,  हर समय, हर पल ,  एक नशा,  एक राह है अधूरी सी,  ल...